Wednesday, February 24, 2021

ऊंचाइ

 कभी ऊंचाइयों में मिलेगे तो कभी गीर कर संभलेंगे,

यह दिल जो आज नाराज़ सा है

कल कई दुआओ से बंद कर सजेगें

आज का गम हम ना लेकर चलेंगे

आपसे शिकायत तो थी पर कल का सूरज उम्मीद पर हैं;

सपनो का महल कल आधा सा था-

खामोशियां कुछ ज्यादा ही थी;

पर गुजरते लहरें कुछ छीन न सकें:

आपका साथ फिर से लौटा।

चाहें ये भी नया सा था तुम्हारे लिए!

जो वक्त के धागों को हम जुड़ते गए,

आज आपका इरादा सा बन गया;

 यह आदत भी काम सा कर गया!