Sunday, June 30, 2019

यादों का काफिला



सुबह की यह सड़के
कुछ कहती है,
रोज़ इन पर गुजरते कदम
खुले आसमान को उड़ते देखा करते है
क्या कोई आस है इनमे?
कोई अनचाही चाह दबे पांव,
कारवाँ में शामिल होते हुए I
आज तुम भी कुछ आलाप रोशन कर दो;
वह अनकहि  बातें सफर के दरमियाँ,
वह अनसुनी यादें जो बरबस हो चुकी है,
उन निगाहों पर चिलमन सी ताक़त आज भी है I
आज तुम भी दुआ के दो कोष सुना दो;
हाथ तो हमारे भी उठेगे उस राह की सलामती पर
गुजरे हुए उस वक़्त की नज़ाक़त
इन राहो पर चहक उठी है,
अशआर लिखे भी दिए जो;
क्या कोई सुनता है?
पगडंडी पर खड़े होकर बस आहे बिछाए,
पर उस सुबह की सड़क पर कुछ देर रुक पाए


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